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हमारे समय की मांग

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है
इस तथ्य को कुछ लोग मात्र साहित्य का एक जरूरी शब्द समझते हैं
तो कुछ लोग मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इस तथ्य को
न केवल सामाजिक बल्कि सांस्कृतिक सच्चाई के साथ साथ व्यवस्थित वैज्ञानिक निष्कर्ष भी मानते हैं
इसे हम इस प्रकार विस्तार से कि जब भी किसी मनुष्य समझें का जन्म होता है तो उसके बढ़ते हुए जीवन क्रम में सर्वाधिक प्रभाव उसके आसपास के वातावरण का ही पड़ता
यही आसपास के वातावरण न केवल किसी मनुष्य को मनुष्य बनाता है बल्कि
सही अर्थों में यही सामाजिक परिवेश उस व्यक्ति को सामाजिक जीव भी बनाता है, अर्थात् जब हम यह कहते हैं कि
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तो उसका समग्र अर्थ यह है कि वह अपने वातावरण से प्रभावित एक ऐसा प्राणी है
जो समाज का अंग है
हमारी हर गतिविधि यह सिद्ध करती है कि हम अपने समय और समाज की जरूरत को किस रूप में देखते हैं
यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि हमारा समाज भी हमारी ही क्रिया प्रतिक्रिया के परिष्कार से निर्मित होता है
इसलिए यह भी हमारे लिए जानना बहुत जरूरी है कि हम जैसे आचरण अपने आसपास के समय और समाज को देते हैं उस 
आचरण का सुफल या कुफल हमें ज़रूर वापस मिलता है  
क्योंकि हम सभी मनुष्य सामाजिक प्राणी हैं इसलिए हम समाज से कट कर या अलग रह कर भी 
अपना बौद्धिक या भौतिक विकास नहीं कर सकते हैं। इस लिए यह आवश्यक है कि हम अपनी पहचान को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हम अपने आचरण के किसी भी संपादन के पूर्व में यह सुनिश्चित कर लें कि
क्या यह हमारे आचरण खुद को हमारे लिए या हम सब के लिए
या फिर मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है यह सच को प्रतिबिंबित करने वाला आचरण है या फिरयहभीड़ में होने का अहसास मात्र दिलाने वाला कोई ऐसा व्यवहार  है कि हम यह तो कहें कि हम मनुष्य हैं
लेकिन वास्तव में हम मानवता से कोसों दूर हों ..
समय की मांग इसका 
 तात्पर्य यह है कि यह समय और समाज बर्बर समय और समाज का उदाहरण नहीं है बल्कि यह विज्ञान का युग है जो हमें इस ओर इशारा करता है कि मैं केवल उतना ही आजाद हूं जितना मेरे पास खड़ा कोई दूसरा व्यक्ति भी आजाद है
कहने का अर्थ यह है कि इस समन्वय वादी काल में यदि हम विकास की ऊंचाई नापना चाहते हैं तो हमें  अपने दिल और दिमाग से   अलगाववादी प्रवृत्ति को सबसे पहले अलग करना चाहिए .क्योंकि यह ऐसा नाजुक समय है कि यदि हमने जरा भी
जाति धर्म और सम्प्रदाय की बात की तो वहीं पर हम पिछड़ जाएंगे।आज हम अंतरिक्ष विचरण यदि विज्ञान की दम पर अपने विकास के लिए करते हैं तो ऐसा सिर्फ इसलिए है कि हम बर्बर और अमानवीय समाज के सत्य से ऊपर उठ चुके हैं। आज अगर हम अपनी साक्षरता दर 1 9 47 की 16% से बढ़कर 75% तक लाने मे सफल हैं  तो केवल इसीलिए कि हम अपने समय और समाज की मांग को समझा और महसूस किया है।
मनुष्य एक सामाजिक
जीव है, यह इसी ओर इंगित करता है कि हम विकास की ऊंचाई को छूने की कोशिश करते हैं,
नफरत की दीवार बनाने की कोशिश नहीं 
मुझे यह भी चाहिए कि मैं  जब भी अच्छाई कहीं और तलाश करूं तो खुद को जानने और जागने की कोशिश भी करूं 
क्योंकि
हम इस बात को कभी चाह कर भी  नहीं भूल सकते कि हम सभी मनुष्य सामाजिक जीव हैं।
धन्यवाद
लेखक:
केपी सिंह केपीएसिंग 9775 @ जीमेल कॉम
मोब: 9651833 9 83

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